Poetry and Literature: स्वप्न दृश्य: स्व.कौशल प्रसाद दुबे की अप्रकाशित कविताएं

Poetry and Literature: स्वप्न दृश्य: स्व.कौशल प्रसाद दुबे की अप्रकाशित कविताएं

Poetry and Literature: स्व.कौशल प्रसाद दुबे की कविता में प्रसाद, निराला, मुक्तिबोध जैसे कथ्य एवं शिल्प दोनों के दर्शन होते हैं :- बसन्त राघव


कोई जन बैठा है खिन्न बदन कौन है ? प्रसाद ?? ना, शायद मनु शायद, गहन विचार मुद्रा, एकाकी घिरी मुख पर अवसाद की बदली, लेकिन वह मनु नहीं और न ही प्रसाद- कोई है अन्य, ‘डूबा सब’ का भाव
अच्छा है, बिलकुल नए सिरे से काव्य सृष्टि करनी होगी, ढूंढ़ने होंगे ऐसे उपमान – रुपक जो हों बिलकुल स्वस्थ निरोगी, गढ़ने होंगे शब्द नए नए प्रतीकनव रस -भाव नूतन ताल लयज्यों मधु ऋतु में छूपी हुई फूट पड़ती नई कोपलें – किसलय
अज्ञेय नहीं होगा कोई भाव कुहरिल अंधेरे में ठोकर खाएं पांववरन सरलतम, जैसा अपना गांव शीतल प्राणद जहां बरगद की छांव, नव काव्य कलेवर का श्रृंगार करेगी नई विधा, सुकुमार मंगलमय होगा यह मन्वंतर, सहज मानवीय संवेदना से जगमग होंगे सबके अभ्यंतर, होगा सबका सम विकास ज्यों बालारुण का किरण जाल अंधकार में कोई कृति सिसक सिसक कर तोड़े न दम
कोई जूही की कली दर दरन भटके ‘प्रकाश’ की खोज में असंख्य नक्षत्रों की भीड़ में कोई ध्रुव खो न जाए….कोई पूर्ण कलाधर अकेला छा न पाए समूचे आकाश में गोधुली की कोख से जन्में क्षीण नील प्रकाश वाले तारक आखिर सजाते काली रजनी का दामन

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“कौन यह, बना रहा निरथर्क रेत महल सागर तीर, जहाँ लहरों की चहल पहल जबसे कर रहा व्यर्थ नाद, प्रवाह कुन्ठित व्यक्ति सा हतोत्साह जानता नहीं, मत्तर्य तल है कर्म स्थल स्पर्धा का विस्तृत रंग महल, सर्वोत्तम ही केवल रह पाता यहां, चल उट्ठ, जो करना है वही कर रच कोई ऐसा अभूतपूर्व महाकाव्य जीवन का वरेण्य – ‘ सहज संभाव्य’.

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वह जन चकित, देखा चतुर्दिक् ‘कौन ? यह अदृश्य, विश्रुत बहुबार परिचित स्वर, मन्द्र नभ के पारकटु सत्य कह कर झंझोड़ दिया, बेसाख्ता चेतना का तार तार, अरे! यह क्या? मिश्रित आभास, कितने रूप झलक गए एक साथ- एक ही आकृति में बार बार, जब बदला दृष्टिकोण बदल गया चेहरा हर बार, ओह चमत्कार
अरे ! महाप्राण निराला आला वाह तभी स्वर में था गंभीर सिंह नाद और वह जैसे अपना ही अन्तर्विरोध हो गया मूर्तिमान – वह मुक्तिबोध अरे अरे! अजान बाहु बापू ? मार्क्स ?? एक ही रुप में दोनो संश्लिष्ट कीट्स, गुरुदेव ओह एक जीवनादर्श कुरूप और डार्विन सर्वथा आश्चर्य, ऐ लो महाकवि पन्त भी दीख गए, सद्यःजात शिशु – परम जिज्ञासु और वह? रक्त स्नान ईशु दयालु नील फलक में जैसे बिछ गए, रक्ता लोकमय युग पुरुष सब बीत गए

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कैसा सामंजस्य ! हद हो गई ताज्जुब कुछ कारणों का खेल कितने आयामों में बिखर गई युग की संवेदना – आकांक्षा महानात्माओं की समानुभूति रंग लाएगी जरूर, अपेल

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सबकी समवेत स्वर लहरियां कैसे हो गई ऐसी विशिष्ट एक कंठ से निकली समाया मीकर्ण कुहर के आर पार तीब्रगामी ईथरिक हलचलों से- उदात्त संवेगो को क्रियमाण करती सी
चल उठा लेखनी ओ कल्पना शील! हम सब कर रहे हैं अवतरण, तुम्हारे मस्तिष्क के ज्ञान कोषों में बनकर ऊर्ध्व चेतना विलक्षण, खोल दो सारे व्दार निषेधों के जालग्रन्थियों के गुम्फन, कोमल बंधन महत्वकांक्षाओं के आश्लेष, जकड़न फैला दो अस्मिता को अखिल विश्व में शंकर बनो, महेश्वर बनो, ओ कवि! धारण करो विकल चेतना की सुरसरिं को
उठा वह जन स्फूर्ति संप्रेषित हनुमान सा आन्दोलित अपने ही भीतर- अपने ही शक्ति केन्द्र में से होकर बढ़ चला निश्चिंत आत्मविश्वास सा, अपनी ही कस्तूरी सुगन्धि से सम्ब्याप्त फैल गया चतुर्दिक्, अपने ही भावोन्मेष से चेतन वह ब्याप गया आकाश सा
पूर्वाग्रहों और संस्कारों की कीवाड़न जाने कब से भिड़े हुए थे दुस्संभावनाओं और किंकर्त्तव्यता की दुर्निवार अंधेरी खोहों में आत्मा थी कब से वन्दिनी ? नैराश्य और कुंठा के तमस गलियारों की खाक कब सेछानती थी आत्माभिव्यक्ति ? द्वार कब से बेचैन था खुलने को प्रकाश कबसे था प्रतीक्षित अहंकार का सांकल गिरने को था आतुर, बस उठने की देरी
इसीलिए जैसे ही उठा वह जनगिर गई अर्गला ,खुल गए व्दारखिड़कियों की लम्बी कतारझपटा प्रकाश, भागा अंधकार
आश्चर्य! जो खड़ा था आगन्तुक वह स्वयं वह था था – वही

प्रमाद की अवस्था में सुनी पगध्वनि सांसो की सरसराहट बेचैनी खुद की थी – खुद की अपनी, वही था दोनों स्थितियों में एक ‘वह’ अंदर था, एक ‘वह’ बाहर था, एक ही प्रतीति के दो छोर, एक ही परिदृश्य के दो कोण
और लो, वहां था ही नहीं दरवाजा केवल भ्रम था, उलटा बड़ा दर्पण था, हवा के अदृश्य हाथों ने सहसा धकेला कि हौले से परावर्ती तलजो बाहर था, घूम गया धीरे से भीतर की ओर, और वह पुरुष हो गया ‘प्रतिबिंबित’ अकस्मात
अन्ततः व्दैत भी मिट गया बिंब से प्रतिबिंब जब सट गया (किन्तु दूसरे ही क्षण) आधेय से आधार हट गया, कि झनझना कर दर्पण टूट गया, बिखर गए फर्श पर टुकड़ेकांच के, पैरों को बेहद गड़े, हो गया लहुलुहान पदतल जगह जगह हो गए अंकित पदचिन्ह रक्त रंजित – शतदल देख वह खड़ा रहा स्तंभित-
‘अरे यहाँ कोई नहीं आया मेरे सिवाय मैं हूँ नितान्त अकेला भ्रमों की बहुस्तरीय भीत्तियों से घिरा था मैं बावला, अच्छा ही है पैर लहू से लथपथ है, कोई पीछे पीछे आ रहा होगा भटकता, निशान ढ़ूढ़ता, पद चिह्नरक्तिम कमल, मेरी उपलब्धि का जरूर करेगा दिशाबोध

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आह! कितनी प्रोद्भास मणियाँ छिपी थी अंदर कितनी स्वाती बूंदे चमकती थी, मोतियों में ढलकर जो छिपी हुई थी, अवचेतन की सीपियों के भीतर
हम अचेत थे, मन है रत्नाकर हम सदा ही रहे भ्रम में, और कल्पना की गुफा खोह तम गलियारों की, इसीलिए रत्नभंडार असीम गुणागार सब डूब रहे काल्पनिक अंधकार में
सागर तो लहराता था हर पल लहरें फेंका करती थी मणियाँ, उज्ज्वलहमी अचेत रहे भ्रामक परिवेश में पराए दर्शन के पाश में बंधे रहे, दूसरों की खोजों के आधार पर जीवन रहस्य, तत्व खोजते रहे बोधि सत्व की बाट जोहते रहे         

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© अप्रकाशित : “अन्तर्विरोध” (काव्य- संग्रह) कवि:- स्व.कौशल प्रसाद दुबे से साभार प्रस्तुति:-  बसन्त राघव, रायगढ़, छत्तीसगढ़, मो.नं. 8319939396

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