सनातन धर्म में न‍िर्जला एकादशी का है व‍िशेष  महत्त्व, जानिए इसके पीछे की पौराणिक कहानी

सनातन धर्म में न‍िर्जला एकादशी का है व‍िशेष महत्त्व, जानिए इसके पीछे की पौराणिक कहानी

Nirjala Ekadashi: Sanatan Religion: सनातन धर्म में 24 एकादशी होती हैं। सभी का अपना-अपना महत्‍व होता है, लेक‍िन ज्‍येष्‍ठ मास की शुक्‍ल पक्ष एकादशी त‍िथि को पड़ने वाली न‍िर्जला एकादशी का व‍िशेष महत्‍व माना गया है। इस एकादशी में पानी पीना पूर्णतया वर्जित है। यही वजह है क‍ि इस एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्‍यता है क‍ि इस एकादशी का व्रत करने से सभी 24 एकादश‍ियों का फल म‍िल जाता है। तो आइए जानते हैं
निर्जला एकादशी को धार्मिक शास्‍त्रों में भीमसेन एकादशी के नाम से भी जानते हैं।

एकादशी की त‍िथ‍ि

इस बार यह एकादशी 21 जून सोमवार को पड़ रही है। निर्जला एकादशी की त‍िथ‍ि 20 जून को शाम 04 बजकर 21 मिनट से आरंभ होगी। यह त‍िथ‍ि 21 जून को दोपहर 01 बजकर 31 मिनट पर समाप्‍त होगी। निर्जला एकादशी के पारण का शुभ मुहूर्त 22 जून को सुबह 05 बजकर 24 म‍िनट से 08 बजकर 12 म‍िनट तक है।

भगवान विष्णु की पूजा

पंडित इंद्रजीत शर्मा ने बताया कि विद्वानों के अनुसार व्रती को गंगा दशहरा के दिन से ही तामसी भोजन का त्याग कर देना चाहिए। साथ ही लहसुन और प्याज मुक्त भोजन ग्रहण करना चाहिए। रात में भूमि पर शयन करें। अगले दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर सबसे पहले श्रीहरि का स्मरण करें। इसके बाद नित्यकर्मों से निवृत होकर स्‍नान के पानी में गंगाजल डालकर स्‍नान करें। अब आचमन कर व्रत संकल्प लें। फिर पीला वस्त्र (कपड़े) पहनें। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें।
सूर्यदेव को जल अर्पित करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा पीले पुष्प, फल, दूर्वा और चंदन और जौ से पूजा करें। फिर ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करें। इसके बाद निर्जला एकादशी की कथा करके आरती करें। इस दिन निर्जला उपवास रखने का विधान है, लेकिन मन में कोई संशय हो या व्रत संबंध‍ित अन्‍य जानकारी चाहिए हो तो व‍िद्वानों से भी परामर्श कर लें। द्वादशी के दिन शुद्ध होकर व्रत पारण मुहूर्त के समय व्रत खोलें। सबसे पहले भगवान विष्णुजी को भोग लगाएं। भोग में कुछ मीठा जरूर शामिल करें। इसके बाद सबसे पहले भगवान का प्रसाद सबको बांट दें। ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर स्‍वयं प्रसाद ग्रहण करें। ध्यान रहे, व्रत खोलने के बाद ही आपको जल का सेवन करना है।

पौराण‍िक कथा

पौराण‍िक कथा के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया तो महाबली भीम ने निवेदन किया- महर्षि आपने तो प्रति पक्ष एक दिन के उपवास की बात कही है। मैं तो एक दिन क्या एक समय भी भोजन के बगैर नहीं रह सकता- मेरे पेट में ‘वृक’ नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता है। तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्यव्रत से वंचित रह जाऊं।
महर्षि ने भीम की समस्या का निदान करते और उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- नहीं कुंतीनंदन, धर्म की यही तो विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता। सबके योग्य साधन व्रत-नियमों की बड़ी सहज और लचीली व्यवस्था भी उपलब्ध करवाता है। अतः आप ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो और तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा। निःसंदेह तुम इस लोक में सुख, यश और प्राप्तव्य प्राप्त कर मोक्ष लाभ प्राप्त करोगे।

वेदव्‍यास के इतने आश्वासन पर तो वृकोदर भीमसेन भी इस एकादशी का विधिवत व्रत करने को सहमत हो गए। इसलिए वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को लोक में पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। मान्‍यता है क‍ि इस दिन जो स्वयं निर्जल रहकर ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को शुद्ध पानी से भरा घड़ा दान करता है। पंखा दान करता हैं फल दान करता हैं उसे जीवन में कभी भी क‍िसी बात की कमी नहीं होती। हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती हैl

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