National Girls Child Day: साहस, बलिदान, दृढ़ संकल्प, प्रतिबद्धता, मजबूती, हृदय, प्रतिभा, हिम्मत.. इन सबसे ही बनी होती हैं लड़कियां

National Girls Child Day: साहस, बलिदान, दृढ़ संकल्प, प्रतिबद्धता, मजबूती, हृदय, प्रतिभा, हिम्मत.. इन सबसे ही बनी होती हैं लड़कियां

National Girls Child Day: इस राष्ट्रीय बालिका दिवस पर, हम एक छोटे शहर की लड़की के धैर्य, दृढ़ता और जोश की कहानी सुनाते हैं जिनसे उसे कठिन समय का सामना करने में मदद की।

“साहस, बलिदान, दृढ़ संकल्प, प्रतिबद्धता, मजबूती, हृदय, प्रतिभा, हिम्मत। इन सबसे ही लड़कियां बनी होती हैं।” — बेथानी हैमिल्टन

जब आप एक बालिका को सशक्त बनाते हैं और उसे शिक्षित करते हैं तो आप एक बेहतर भविष्य के निर्माण में मदद करते हुए, पितृसत्ता और गरीबी की बेड़ियों को तोड़ते हुए और आर्थिक विकास में सहयोग करते हुए, एक राष्ट्र को सशक्त बनाते हैं। राष्ट्रीय बालिका दिवस, हर साल 24 जनवरी को मनाया जाता है, जो हमारे देश में लड़कियों को सहायता और नए अवसर प्रदान करने के साथ-साथ उनके सामने आने वाली असमानताओं, भेदभाव और शोषण के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करने पर ध्यान केंद्रित करता है। इस आंदोलन की शुरुआत महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 2008 में की थी।

सरकार की पहल ने कई लड़कियों को सशक्त बनाया है, जिन्होंने अपनी सफलता की कहानियां स्वयं लिखी हैं। इस वर्ष, हम नीलम दानसेना की उपलब्धियों का जश्न मनाएंगे, जिन्होंने न केवल वैश्विक महामारी के दौरान अपने परिवार को बचाए रखने में मदद की, बल्कि एक छोटा बुटीक खोलने के अपने सपने की दिशा में भी काम कर रही है।

छत्तीसगढ़ के मिलूपारा गांव की रहने वाली नीलम दानसेना कहती हैं कि “मुझे पढ़ाई में और अपने गांव के सरकारी स्कूल में जाने में जितना मज़ा आता था, सिलाई में भी मुझे उतना ही मज़ा आता था। घर पर, मैं अपने दादाजी की सिलाई मशीन पर अभ्यास करती, जिसमें बटन टांकने, छोटी-मोटी सिलाई करने से लेकर बैग बनाना तक शामिल रहता था। मुझे उस पुरानी मशीन पर काम करना पसंद था।” नीलम के परिवार में उसके पिता हैं जो एक छोटी-सी निजी फर्म में काम करते थे, एक गृहिणी माँ थी और एक छोटा भाई था। जैसे-जैसे आर्थिक स्थिति खराब होती गई, यह सुनिश्चित करने के लिए कि उसका भाई स्कूल नहीं छोड़े, नीलम को अपनी पढ़ाई बंद करनी पड़ी।

नीलम ने जब स्कूल छोड़ा और घर के कामों पर ध्यान केंद्रित किया, तब वह 12वीं कक्षा में थी। वह हमेशा अपने परिवार को आर्थिक रूप से मदद करना चाहती थी। 22 वर्षीय नीलम ने बताया कि “कोविड -19 महामारी ने हमारे परिवार पर कहर बरपाया। मेरे पिता अकेले कमाने वाले थे, उनकी नौकरी छूट गई और उन्होंने खेती करना शुरू कर दिया। मेरे भाई की कक्षाएं ऑनलाइन हो गईं, और मैं अक्सर उसकी ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान नई चीजें सीखने की कोशिश करती था। हमारी बचत कम होता जा रही थी, जिससे स्थिति बहुत कठिन होती जा रही थी।”

हालांकि मिलूपारा में नीलम और उनके जैसे कई अन्य लोगों के लिए, अदाणी कौशल विकास केंद्र (एएसडीसी) के जीवन-कौशल पाठ्यक्रम नई आशा की किरण के रूप में आए। नीलम ने बताया कि “महामारी से ठीक पहले, मैंने कुछ दोस्तों के साथ एएसडीसी की सिलाई कक्षाओं में दाखिला लिया। हालांकि हम चिंतित थे कि लंबे समय तक लॉकडाउन के कारण, ऑन-ग्राउंड प्रशिक्षण ठप हो सकता है, लेकिन जल्द ही पाठ्यक्रमों को ऑनलाइन कर दिया गया। मैं शुरुआत में थोड़ा अनिच्छुक थी, लेकिन फिर मेरा भरोसा जम गया।”

हम में से कई लोगों की तरह, जब नीलम ने अपना ऑनलाइन प्रशिक्षण शुरू किया, तो उसके सामने कुछ शुरुआती समस्याएं रहीं, लेकिन जल्द ही एक नया कौशल सीखने के अपने जोश और उत्साह के साथ, उसने उन सारी समस्याओं को दूर कर लिया। नीलम ने मुस्कुराते हुए बताया कि “सौभाग्य से, मेरे भाई और मेरी कक्षा का समय अलग-अलग था, इसलिए फोन को लेकर कोई झगड़ा नहीं होता था। हालांकि नेटवर्क कनेक्टिविटी हमेशा सबसे बड़ी बाधा बनी रही। लेकिन एएसडीसी के शिक्षक हमारे साथ बेहद धैर्यवान रहते थे और जब तक हम पूरी तरह से समझ नहीं लेते, तब तक वे चीजों को दोहराते रहते थे। हमारा पाठ्यक्रम 3-4 महीने का ही था, लेकिन हमें अगले 2-3 महीनों में रिविजन के लिए अन्य बैचों में शामिल होने की आजादी दे दी गई।”

प्रशिक्षण अवधि के दौरान, नीलम ने 200 फेस मास्क (कपड़ा और कपास के) बनाए, जो गांव के दुकानदारों द्वारा खरीदे और बेचे जाते रहे, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद मिली। इसके बाद, नीलम को छोटे-छोटे ऑर्डर मिलने लगे और कुछ ही महीनों में उसने ब्लाउज़, फ्रॉक, सलवार सूट, बैग, तकिये कुशन और अन्य कई चीजें सिलना शुरू कर दिया। नीलम ने कहा कि “जब एक बालिका के रूप में मैं परिवार की आर्थिक रूप से मदद कर रही हूं तो इससे मैं स्वयं को सशक्त महसूस करती हूं। मेरे पास और ऑर्डर आने लगे हैं और मैं इसका पूरा आनंद उठाती हूं।”

एक खुशहाल उद्यमी के रूप में काम कर रहीं नीलम कहती हैं कि “एएसडीसी मेरे जैसे कई लोगों को अपने घरों में ही रहकर एक टिकाऊ आय प्राप्त करने में मदद करने वाला शक्तिशाली उत्प्रेरक रहा है। मैंने हमेशा अपने गृहनगर में एक छोटा बुटीक खोलने का सपना देखा था और यहां मौजूद टीम अब मुझे उसके लिए मार्गदर्शन कर रही है।” यह पूछे जाने पर कि क्या वह भी निकट भविष्य में समूह के लिए प्रशिक्षक बनना चाहेंगी, नीलम का झट से जवाब आया कि “बिल्कुल, मेरे ट्यूटर्स ने मुझे बहुत अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया है और अगर मौका दिया गया तो मैं इस ज्ञान को मेरी जैसी कई अन्य लड़कियों के साथ साझा करना पसंद करूंगी।”

छत्तीसगढ़ रायपुर