Journey of life:   पुण्यतिथि पर विशेष: छत्तीसगढ़ के माटीपुत्र रामाधार कश्यप

Journey of life: पुण्यतिथि पर विशेष: छत्तीसगढ़ के माटीपुत्र रामाधार कश्यप

Journey of life: (प्रस्तुति: डॉ . देवधर महंत): आज हम अपने छत्तीसगढ़ राज्य में सांस ले रहे हैं। 1 नवम्बर 2022 को छत्तीसगढ़ 22 वर्ष का हो जाएगा, लेकिन पृथक छत्तीसगढ़ पाने की यात्रा में आंदोलनों और संघर्षों की एक लंबी श्रृंखला रही है।

विपुल खनिज भंडार, वन संपदा और कृषि प्रधान क्षेत्र होने के बावजूद जांगर पेरनेवाले छत्तीसगढ़ के कमिया किसान उपेक्षित- तिरस्कृत रहे हैं। यह घोर विडंबना रही है कि अपनी ही माटी में छत्तीसगढ़िया छले ठगे जाते रहे हैं। हमारे जन नायकों ने शोषण और दोहन से मुक्ति के लिए एकमात्र समाधान बताया, पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना। छत्तीसगढ़ियों में स्वाभिमान की कमी रही है।

पवन दीवान को कहना पड़ा:-

छत्तीसगढ़ में सब कुछ है पर एक कमी है स्वाभिमान की, 
मुझसे सही नहीं जाती है, ऐसी चुप्पी वर्तमान की।

शनैः शनैः छत्तीसगढ़ियों में अपनी अस्मिता की रक्षा और स्वाभिमान की भावना जागृत होने लगी। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की मांग जो पकड़ने लगी। इस दिशा में पं . सुन्दरलाल शर्मा, ठाकुर प्यारेलाल सिंह , बैरिस्टर छेदीलाल, डॉ . खूबचंद बघेल, बिसाहू दास महंत, हरि ठाकुर, पवन दीवान, चंदूलाल चंद्राकर आदि की सूची में रामाधार कश्यप का नाम सगर्व लिया जा सकता है पृथक छत्तीसगढ़ आंदोलन का स्वतंत्र निष्पक्ष और सम्यक इतिहास लिखा जाना अभी बाकी है। 

पृथक छत्तीसगढ़ आंदोलन को गति देने, छत्तीसगढ़ की अस्मिता की रक्षा करने एवं स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए डॉ . खूबचंद बघेल ने 25 सितंबर 1967 को कुर्मी बोर्डिंग रायपुर में एक सभा बुलायी और छत्तीसगढ़ भातृ संघ की स्थापना की। इस सभा में रामाधार कश्यप भी उपस्थित थे। वे डॉ . खूबचंद बघेल के विचारों से प्रभावित हुए। तभी से वे छत्तीसगढ़ भातृ संघ से आमूल – चूल जुड़ गए। डॉ . खूबचंद बघेल ने अपना अंतिम पत्र अपने दामाद दाऊ रामचंद्र देशमुख को लिखा था , जिसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिये लोक जागरण की बात कही गई थी। दुर्भाग्य से 22 फरवरी 1969 को डॉ . खूबचंद बघेल का दिल्ली में असामयिक निधन हो गया। उस समय वे राज्य सभा के सदस्य थे। उनका पार्थिव शरीर दिल्ली से मालगाड़ी के डिब्बे में भेजा गया।

इस अपमानजनक घटना से रामाधार कश्यप अत्यंत आहत और व्यथित हुए और क्रांतिकारी कदम उठाने की योजना बनाते रहे। आखिर वह दिन भी आ गया और 28 जून 1969 को उन्होंने मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक छत्तीसगढ़ की मांग बाबत पर्चा फेंका। उन्हें विधान सभा उठने तक की सजा दी गयी। रामाधार कश्यप , पवन दीवान , परसराम यदु आदि के सम्मिलित प्रयासों से छत्तीसगढ़ भातृ संघ की गतिविधियों में तेजी आने लगी। लोक जागरण के अभियानों से छत्तीसगढ़ के विरोधी विचलित होने लगे। अपनी जमीन खिसकती नज़र आयी।

इसी की परिणति थी तात्कालीन मध्य प्रदेश शासन द्वारा अपने ज्ञापन दिनांक 23.9.1971 द्वारा शासकीय सेवकों के छत्तीसगढ़ भातृ संघ की गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस शाही फरमान से रामाधार कश्यप अत्यंत क्षुब्ध और आक्रोशित हुए। तात्कालीन मुख्यमंत्री जब विक्रय कर भवन के उद्घाटन हेतु बिलासपुर पधारे तो मुंगेली नाका के पास कश्यप जी ने उन्हें काला झंडा दिखा दिया और मुर्दाबाद के नारे लगाए। इनके विरोध और प्रतिकारात्मक प्रयासों की परिणति थी कि अंततः म.प्र . शासन को झुकना पड़ा और म.प्र. शासन के ज्ञापन दिनांक 19.05.1974 द्वारा छत्तीसगढ़ भातृ संघ पर लगाया गया प्रतिबंध हटा दिया गया। वस्तुतः यह कश्यप जी के अथक संघर्ष की नैतिक जीत थी।

डॉ . खूबचंद बघेल के अंतिम पत्र से प्रेरित होकर उनके दामाद दाऊ रामचंद्र देशमुख ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिये लोक जागरण के लिए चंदैनी गोंदा का निर्माण किया। इसका प्रथम प्रदर्शन 7 नवंबर 1971 को ग्राम बघेरा ( दुर्ग ) में हुआ। इसमें अपने साथियों के साथ रामाधार कश्यप भी उपस्थित हुए। वे दाऊ रामचंद्र देशमुख से खुले मन से से जुड़ गये। योजना थी कि चंदैनी गोंदा के प्रदर्शनों के जरिये छत्तीसगढ़ की अस्मिता की अलख जगायी जा सकेगी। स्वयं कश्यप जी ने 20 अक्टूबर 1973 को बृहस्पति बाजार में तथा 25 एवं 26 दिसंबर 1974 को लाल बहादुर शास्त्री म्युनिसिपल हायर सेकेण्डरी स्कूल में चंदैनी गोंदा का आयोजन करवाया और अनेक स्थलों में आयोजनार्थ प्रेरित किया।

कश्यप जी 24 जुलाई से 9 अगस्त 1983 तक अखिल भारतीय रचनात्मक कार्यकर्ता समाज के तत्वावधान में पंजाब के 50 ग्रामों की 15 दिवसीय राष्ट्रीय एकता यात्रा में केयूर भूषण जी के साथ शामिल हुए। इस यात्रा से श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रभावित हुई। उन्होंने अखिल भारतीय रचनात्मक समाज के लोगों से कहा कि आप जैसे अच्छे लोगों को राजनीति में आना चाहिए वर्ना गलत लोग राजनीति में आ जायेंगे। तब कश्यप जी ने उनसे प्रेरित होकर वर्ष 1983 में कॉंग्रेस की सदस्यता ली। आगे चल कर वे जिला कॉंग्रेस कमेटी के प्रवक्ता किसान कॉंग्रेस के जिलाध्यक्ष तथा जिला कॉंग्रेस कमेटी बिलासपुर के अध्यक्ष बने।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने पर वे 2002 में राज्यसभा सदस्य बनें वर्ष 2003 में अकलतरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए, लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर राज्यसभा की सदस्यता बरकरार रखते हुए विधायक पद से इस्तीफा दे दिये। उल्लेखनीय है कि 1977 में चुनौतियों के बीच वे कृषि उपज मंडी अकलतरा के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए थे। राजनीति में रहते हुए उनके दामन पर कोई दाग नहीं लगा। कश्यप जी राजनैतिक शुचिता के पक्षधर थे। राज्यसभा सदस्य रहते हुए उन्होंने कभी भी अपने ऊपर वी.आई.पी. कल्चर हावी होने नहीं दिया।

वे गरीब गुरबों की आवाज़ थे। उनकी बातों में गरीबों का दर्द झलकता था। गरीबों के अधिकारों के लिए वे अपने लोगों से भी लड़ जाते थे। यहाँ तक कि अपनी सरकार के खिलाफ भी खड़े हो जाते थे। राज्यसभा सदस्य रहते हुए उन्होंने कोल माफियाओं के खिलाफ कोरबा में संघर्ष किया । इस आंदोलन के वजह से ही केन्द्र सरकार ने सांसद लल्लन सिंह , सांसद चंद्रशेखर दुबे जैसे लोगों की टीम बनाई और यह टीम जाँच हेतु कोरबा दौरे पर आयी।

कश्यप जी ने अपने गृह ग्राम चोरभट्टी के महामाया मंदिर में बलि प्रथा बंद करवा दी थी। पांडातराई कांड के बाद समझौते और शांति बहाली में भी कश्यप जी की अग्रणी भूमिका रही। इनके संघर्ष और पराक्रम की अनेक कहानियाँ है। 

कश्यप जी अक्खड़ छत्तीसगढ़िया थे। वे मंच पर हमेशा छत्तीसगढ़ी में ही बोलते थे। उनसे कोई मिलने आता तो उनसे छत्तीसगढ़ी में ही बतियाते थे। बिलासपुर में विश्वविद्यालय स्थापना की मांग लेकर जब प्रतिनिधि मंडल के साथ वे श्रीमती इंदिरा गाँधी से मिले तो उन्होंने छत्तीसगढ़ी में ही अपनी बात रखी। दिल्ली में सांसद रहते हुए एक बार प्रेस कांफ्रेन्स ली,तो उन्होंने छत्तीसगढ़ी में ही संबोधित किया। पत्रकारों के सवालों के जवाब कश्यप जी ने छत्तीसगढ़ी में ही दिए। कश्यप जी का एक बड़ा सपना था कि छत्तीसगढ़ी में एक दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन हो, लेकिन उनका यह सपना अधूरा रह गया। वे स्वयं छत्तीसगढ़ भातृ संघ की बुलेटिन निकालते रहते थे। जिसमें छत्तीसगढ़ महतारी की पीड़ा व्यक्त होती थी और पवन दीवान की आग उगलती कविताएँ हुआ करती थीं। 

रामाधार कश्यप के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को रेखांकित करने के उद्देश्य से एक ग्रंथ ” पृथक छत्तीसगढ़ आंदोलन के दुर्धर्ष नायक रामाधार कश्यप को आकार दिया गया है। इसमें उनसे जुड़े हुए लोगों के लेख एवं संस्मरण शामिल हैं। इस कृति का आवरण चित्र तैयार किया है मुंबई के आर्टिस्ट बी जी नारायणराव एवं जबलपुर के घनश्याम पटेल ने यद्यपि कश्यप जी के विराट और विशाल व्यक्तित्व तथा उनके अवदान को 208 पृष्ठों में निबद्ध नहीं किया जा सकता, लेकिन हम आशान्वित हैं कि इस ग्रंथ के प्रकाशन से कश्यप जी को निकट से जानने – पहचानने और समझने की एक दृष्टि अवश्य मिलेगी।

यह संताप का विषय है कि छत्तीसगढ़ राज्य बने दो दशक बीत गया, लेकिन पृथक छत्तीसगढ़ आंदोलन के इस दुर्धर्ष नायक, छत्तीसगढ़ महतारी के इस दुलरवा सपूत, माटीपुत्र रामाधार कश्यप की स्मृतियों को संजोने की दिशा में आज पर्यात कोई सार्थक पहल नहीं हो पायी है। 

अंत में स्मृतिशेष रामाधार कश्यप जी के प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी संघर्षशीलता और कर्मठता कोनमन करता हूँ इन शब्दों के साथ – 

    अपने हक के लिए धरा पर , जो करते संघर्ष । 
    ऐसे दुर्धर्षों का यश गाता , इतिहास सहर्ष ।

कथा साहित्य छत्तीसगढ़