क्या यही है वह आजादी, जिसका शहीदों ने देखा था सपना ?

क्या यही है वह आजादी, जिसका शहीदों ने देखा था सपना ?

  • स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी दयाराम ठेठवार जी की 100 वीं जयंती पर विशेष

गणेश कछवाहा, रायगढ़। आज 14 अप्रैल को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दयाराम ठेठवार जी की 100 वीं जयंती है। देश आज़ादी के 75 वीं वर्षगाँठ पर आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के जुनून, उनके अदम्य साहस, समर्पण, प्रतिबद्धता, त्याग बलिदान, शहादत और कुर्बानियों की कहानियों से दिल भर जाता है, पूरे तन में सिहरन सी उठने लगती है, मस्तक गर्व से ऊँचा उठने लगता है, सीना चौड़ा, मुट्ठियाँ बंधने लगती है और ह्रदय की अनंत गहराइयों से स्वतः ही इंक़लाब ज़िंदाबाद, वंदेमातरम्, जय हिंद, भारतमाता की जय के स्वर फूटने लगते हैं। अभी देश आज़ादी की 75 वीं वर्षगाँठ पर “आज़ादी का अमृत महोत्सव” शासकीय स्तर पर मना रहा है। जन भागीदारी अपने जीवन और रोज़मर्रा के बुनियादी सवालों व समस्याओं को सुलझाने में उलझी हुई है। इससे थोड़ा बाहर निकलकर आज़ादी के 75 साल की यात्रा और महोत्सव के विषय में सोचती है तब संविधान, लोकतंत्र, सर्वधर्म समभाव की आदर्श संस्कृति, साँझे संस्कार की बेमिशाल विरासत को बचाने के गहरे और महत्वपूर्ण सवाल ह्रदय और मस्तिष्क को झकझोरने लगती है।

स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी दयाराम ठेठवार


जब माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जनता से यह निवेदन करे कि ‘देश के संविधान और लोकतंत्र की रक्षा कीजिये ‘संस्कृति कर्मी,कलाकार, लेखक, विचारक और विद्वतजन ये कहने लगे कि ‘संस्कृति, सभ्यता, आदर्श, नैतिकमूल्य, विरासत और धरोहर को संरक्षित करने की आवश्यकता है।’ कृषिव्यवस्था और परम्परा को बचाने के लिए देश के अन्नदाताओं को एकवर्ष से ज़्यादा आंदोलन करने हेतु विवश होना पड़े।छात्र सस्ती, उत्कृष्ट और समान शिक्षा, युवा रोज़गार के लिए आत्महत्या करने बाध्य हो, भुखमरी और ग़रीबी ख़तरनाक भीषणतम सूचकांक पर हो। राष्ट्रीय एकता अखंडता, धार्मिक सद्भाव, भाईचारा, अतिथि देवो भव की पावन संस्कृति के तानाबाना को तारतार करने की अपवित्र मानसिकता विकसित हो रही हो तब ऐसे समय में शहीदे आज़म भगतसिंह, अश्फ़ाक, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्र्शेखर आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी जैसे असंख्य शहीदों की शहादत नमन करते हुए शायद यह सवाल उठना ज़्यादा प्रासंगिक हो जाता है कि- क्या शहीदों ने इसी आज़ादी का सपना संजोया था?

15अगस्त 1947 को अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा भारतवर्ष की लगभग 450 देशी रियासतों को स्वतंत्रता दी गयी थी, इसके उपरांत हमारे राष्ट्रीय विचारधारा के नेतृत्व पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं डॉ राम मनोहर लोहिया सहित अनेकों गणमान्य नेताओं के आव्हान पर देशी रियासतों को भारत-संघ निर्मित कराने के लिए देशी रियासतों के विलीनीकरण के आंदोलन प्रारम्भ कर दिया जिससे भारत–निर्मित करने का स्वप्न साकार हो सका ऐसे सभी विलीनीकरण के आंदोलनकारियों को भारत सरकार द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के दर्जा प्रदान किया उन्ही अनगिनत सेनानियों में समाजवादी विचारधारा के साथी दयाराम ठेठवार भी सम्मिलित हैं।

“शोषण मुक्त समाज के लिए समाजवाद की स्थापना होना बहुत आवश्यक है ।संपूर्ण आज़ादी तभी मानी जाएगी जब रियासतों,राजा रजवाड़ों का स्वतंत्र भारत के शासन (गणतंत्र) में पूर्ण विलीनीकरण होगा।” उक्त उद्गार रियासतों के विलीनीकरण अभियान के दौरान स्थानीय सुभाष चौक में सभा को संबोधित करते हुए ठेठ समाजवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दयाराम ठेठवार ने व्यक्त किया था।

देश की आजादी का जुनून, उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम पंक्तियों के संघर्षशील साथियों के साथ पूरी सक्रियता से जोड़े रखा। जिसमें प्रमुख रूप से पंडित किशोरीमोहन त्रिपाठी, सिद्धेश्वर गुरु,,जननायक रामकुमार अग्रवाल, दयाराम ठेठवार,बारेंद्र नाथ बनर्जी, अमर दास उदासी, तोड़ाराम जोगी, ब्रजभूषण शर्मा, दुलीचंद शर्मा, श्याम नारायण कश्मीरी, बंदे अली फातमी, मामा बनारसी आदि आज़ादी के दीवानों की एक मजबूत टोली थी।

कई साथियों ने ब्रिटिश शासन के असहनीय उत्पीड़न के शिकार हुए पर आज़ादी का जुनून कम नहीं हुआ। सभी राष्ट्रीय आव्हान और स्थानीय रणनीति को बहुत संभाल कर, लेकिन पूर्ण साहस और जज्बे के साथ अंजाम देते थे जिसकी सूचना ब्रिटिश हुक्मरानों को होती और वे बहुत विचलित और परेशान होते थे। कई दफा इन साथियों को अंडर ग्राउंड होना पड़ा।

सन 1943 में स्वंत्रता आंदोलन के दौरान रेल रोको आंदोलन में रेलपटरी का नट खोलते समय ब्रिटिश सरकार ने इन पर साथियों सहित कठोर दमनात्मक कार्यवाही की। अमानवीय उत्पीड़न किया गया। सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी और भूमिका रही रियासत के विलीनी करण आंदोलन में। जिसमे कई बार गिरफ्तारी भी हुई। स्वतन्त्रता आन्दोलन और विशेषकर रियासतों के विलीनीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका व अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने दयाराम ठेठवार जी को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के सम्मान से सम्मानित किया।

समाजवादी विचारधार से ओतप्रोत ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज और साफगोई (स्पष्टवादिता) ने छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को बहुत प्रभावित किया। स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, ख्यातिलब्ध बैरिस्टर छेदी लाल, डॉ खूब चंद बघेल, चंदू लाल चंद्राकर बहुत सम्मान देते थे।सन 1956 में डॉ खूब चंद बघेल ने छत्तीसगढ़ भारत संघ का गठन किया तब दयाराम ठेठवार को उपाध्यक्ष बनाया तथा सन 1981 में वरिष्ठ राजनेता चंदूलाल चंद्राकर ने पृथक छत्तीसगढ़ राज्य का जिलाध्यक्ष बनाया। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन के लिए सर्वदलीय मंच का गठन किया गया। और रेल रोको आंदोलन में दयाराम ठेठवार सहित स्व. नंदकुमार पटेल, जगदीश मेहर, अंबा लाल पटेल, श्यामलाल पटेल, संतोष अग्रवाल, दामोदर सिंह राजपूत सहित अनेक साथियों की गिरफ्तारी हुई।

पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के प्रखर ठेठ छत्तीसगढ़िया नेता के रूप में पूरे छत्तीसगढ़ में अलख जगाते रहे। लेकिन छत्तीसगढ़ बनने के बाद राजनैतिक ,प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था से बहुत दुखी थे।वे प्रायः कहते थे –“हमारे सपनों को कुचल दिया गया है।”

दयाराम ठेठवार , स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पूर्व विधायक जननायक रामकुमार अग्रवाल के बाल सखा थे। समाजवादी जननायक रामकुमार अग्रवाल उनके प्रेरणा स्त्रोत थे। समाजवादी आंदोलन व जन संघर्षों के भी सखा थे। देश की आजादी के बाद अन्तिम सांस तक दोनो साथी (जननायक रामकुमार अग्रवाल और दयाराम ठेठवार) अन्याय, अत्याचार, दमन, शोषण और सामाजिक न्याय तथा मानवीय मूल्यों के लिए अनवरत संघर्ष करते रहे।

सन 1990 के बाद रायगढ़ जिले सहित सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में जल जंगल और जमीन को बचाने का आग्रह तथा लंबे संघर्ष का आव्हान किया।वर्तमान पीढ़ी जनजीवन, जल जंगल और जमीन को बचाने के आंदोलन की साक्षी है। जिला बचाओ संघर्ष मोर्चा की स्थापना कर शासन द्वारा कमरे के अंदर की जाने वाली औपचारिक जनसुनवाई को पूरे देश मे आम जन के बीच खुले मैदान में करवाने की परंपरा की शुरुआत की गई। जल जंगल जमीन और जनजीवन को बचाने के आंदोलन को राष्ट्रीय पटल पर रेखांकित किया। पानी को बचाने और कृषि तथा किसान के जीवन की रक्षा हेतु केलो डेम बनाने की आवाज उठाई गई। अनंत आंदोलन और असंख्य संघर्षों की एक लंबी श्रृंखला है।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल सखा जन नायक रामकुमार अग्रवाल के निधन के बाद वे काफी टूट सा गए थे।जन नायक रामकुमार अग्रवाल के बाद दयाराम ठेठवार आजीवन जिला बचाओ संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष रहे। निरंतर लगभग 25 वर्षों तक अपने वार्ड के सम्माननीय और सक्रिय पार्षद रहे। वर्तमान में आपके भतीजे श्री जयंत ठेठवार नगर निगम रायगढ़ के सभापति के पद पर आसीन हैं। जिला कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष भी रहे हैं।

बदलती राजनैतिक परिस्थितियों,सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव ,बढ़ती अवसर वादिता, पूंजीवाद के चौखट पर नतमस्तक होते लोकतंत्र को देखकर काफी चिंतित व दुखी होते थे। विकास की नई परिकल्पना को पूर्णतः खारिज करते हुए उसे विनाश की संज्ञा देते थे। उन्होने स्वयं जिला प्रशासन और नगर निगम से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपने बाल सखा जन नायक रामकुमार अग्रवाल की मूर्ति स्थापना हेतु आग्रह किया था ।प्रशासन सहित समस्त राजनैतिक दलों एवम् प्रतिष्ठित नागरिकों द्वारा सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पारित किया गया लेकिन आज तक मूर्ति स्थापना नहीं की गई। निधन के तीन दिन पूर्व समाजवादी साथी बासुदेव शर्मा और मुझसे अपने मन की पीड़ा को साझा करते हुए कहा कि अभी तक रामकुमार की मूर्ति की स्थापना क्यों नहीं की गई। चलो कल निगम दफ्तर का घेराव करेंगे, धरना देंगे। बासुदेव शर्मा ने ढांढस बंधाते हुए कहा आदरणीय आप अभी विश्राम कीजिए डॉ ने बेड रेस्ट के लिए कहा है।निगम में प्रस्ताव पारित हो गया है काम जारी है आपके रहते रहते मूर्ति स्थापना हो जायेगी, आप चिन्ता न करें, लेकिन अफसोस की दयाराम ठेठवार जी नहीं रहे। जनसहयोग से मूर्ति स्थापित की गई है जो अनावरण की प्रतीक्षा में है। यह हमारी राजनैतिक और सामाजिक व्यव्यस्था के आचरण और संस्कार का उदाहरण है।

संक्षिप्त जीवन वृत्त –
नाम – दयाराम ठेठवार
पिता – स्व. श्री कपिल ठेठवार
माता – स्व.श्रीमती रमा देवी ठेठवार
पुत्री – श्रीमती सरिता यादव
दामाद – श्री मनोहर यादव
नाती – श्री शुभम
नातिन – कु.श्वेता यादव
जन्म – 14 अप्रैल 1922
निधन – 28 जुलाई 2019

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.दयाराम ठेठवार 97 वर्ष की जीवन यात्रा में कभी थके नहीं रुके नहीं। लकवा ग्रस्त होने के बावजूद लकड़ी का सहारा लेकर अपने मोहल्ले के गांजा चौक तक जाते अपने चिर परिचितों से मिलते एक दूसरे का सुखदुख पूछते देश समाज की चर्चा करते। 28 जुलाई 2019 को दोपहर लगभग 12.30 उन्होने अन्तिम सांस ली। जैसे ही लोगों तक यह खबर पहुंची लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचने लगे। अगले दिवस 29 जुलाई को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। अन्तिम यात्रा में इंकलाब जिंदाबाद,स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ज़िंदाबाद, देश के अमर शहीदों अमर रहो के जोशीले नारों से गालियां गूंज उठी। हम ऐसे जीवंत संघर्षशील व्यक्तित्व को सलाम करते हैं और शासन से मांग करते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दयाराम ठेठवार जी की मूर्ति स्थापना अतिशीघ्र कर अपने विरासत और धरोहर को अक्षुण्ण बनाएं, आने वाली पीढ़ी को उससे परिचित कराएं और आज़ादी के अमृत महोत्सव को पूरेशानसेउत्सवित करें। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.दयाराम ठेठवार के शताब्दी वर्ष (100 वीं जयंती ) पर सादर नमन

(समाजवादी साथी एवम् जिला बचाओ संघर्ष मोर्चा रायगढ़ के सचिव श्री बासुदेव शर्मा एडवोकेट से प्राप्त जानकारी, विचार, सुझाव और वार्ता से संकलित)

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